अहीर नृत्य एक पारम्परिक नृत्य प्राचीन काल में जब कोई मनुष्य या समाज या समुदाय कोई विशेष वसतु की जिसमें उनका स्वार्थ निहित हो प्राप्ति पर अधिकाधिक आनंदित या आल्हादित हो जाता था, फलस्वरूप खुशी से झूमने लगता तथा आनंद का प्रतिबिंब चेहरे पर झलक आता साथ ही मुख से भी आनंद तथा उत्साह का शब्द प्रस्फुटित होने लगता था क्योंकि इस तरह के आनंद का उपज हृदय स्थल से होता है। इस प्रकार नृत्य की शुरुआत हुई होगी। वैदिक काल में ग्वाल वंश इंद्रदेव की पूजा अर्चना करते थे। द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के पूजा अर्चना पर प्रतिबंध लगा दिया तथा अपने ग्वालों को संदेश दिया कि तुम सभी गो को माता मानकर गोपालन करो तथा गोवर्धन पर्वत की पूजा करो। साथ ही कर्म को आधार मानने का संदेश भी दिया। यह सामूहिक नृत्य उक्त संदेश के पूर्ण सम्मान तथा स्मृति में आज भी हमारे बीच प्रचलित है। जिसे राउत नाच, मड़ई, राऊताही, अहिर नाच आदि नामों से उच्चारित करते हैं। अपने परम्परा को निबाहते हुए राउत जाति के अधिक से अधिक व्यक्ति सजधजकर, पूर्ण उत्साह के साथ एक मंच में नृत्य करते हैं। मड़ई कहा जाता है। हमारे छत्तीसगढ़ के पावन धरती में मड...
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